Friday, May 6, 2022

भगवतगीता : यादव जाति को सजातीय ईश्वर देकर बरगलाने की साज़िश ।



भारत में संख्या में सबसे बड़ी जाति यादव है । यह बात ब्राह्मण शुरू से जानता था । ब्राह्मणों के ग्रंथों को आंशिक रूप से सत्य माना जाए तो #सांकेतिक साक्ष्य बताते हैं कि महाभारत में आर्यों के सबसे ताकतवर देवता ,देवराज इंद्र से कृष्ण के (गौवर्धन पर्वत उठाने वाले) युद्ध का जिक्र है । 
कृष्ण के पास उस काल की सबसे बड़ी सेना है ,जिसे दुर्योधन कृष्ण से माँगकर अति प्रसन्न होता है । (वही , अध्याय 7 )
युधिष्ठिर द्वारा किए गए राजसूय यज्ञ में कृष्ण को उच्च आसन दिए जाने का शिशुपाल समेत कई राजाओं द्वारा विरोध दर्ज किया गया । 
शांति का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर गए कृष्ण को राजभवन में भोजन न खिलाकर विदुर के घर खिलाया जाता है ,जो बताता है कि वो शूद्र कुल से थे । 
दुर्योधन व भीम के गदा युद्ध में कृष्ण द्वारा छल किए जाने से नाराज दुर्योधन कृष्ण को "नीच कुल की पैदाइश" बताता है तथा देवगण भी इसे स्वीकारते हैं ।
वैसे भी जिस तरह के नाम कृष्ण को दिए गए हैं ,वो बताते हैं कि वो #शूद्र थे । ग्वाला ,गोपाल ,माखनचोर ,रणछोड़ ( वही , अध्याय 70 ) जैसे उपनाम देकर उन्हें नीचा दिखाने के लिए ही दिए गए हैं । 
हिंदुओं के आदिगुरू #शंकराचार्य भी कृष्ण-मत के बिरोधी रहे हैं ।
    लेकिन अचानक ही ब्राह्मण उन्हें भगवतगीता में, जो इसी महाभारत का हिस्सा है , #ईश्वर_परमेश्वर बना कर पेश करता है । एक ही ग्रंथ में इतना विरोधाभास ??

कल का शूद्र ,विष्णु का अवतार बन जाता है । मोक्ष की बात करता है , खुद शूद्र होने का दंश झेलने वाला चातुर्वर्ण्य की वकालत करता है । यज्ञ ,बलि ,हवन जैसे कर्मकांडों की जिन शूद्रों को मनाही रही ,उन्ही को पुनर्स्थापित करने का आह्वान करता है । 
आखिर ये बदलाव क्या समझा जाये ???

बाबा साहब (क्रांति तथा प्रतिक्रांति वॉल्यूम 7  )लिखते हैं कि ब्राह्मणों का धंधा ईश्वर का भय ,आस्था से जुड़ा हुआ है  , उनकी किसी एक ईश्वर में आस्था कभी नही रही । वो किसी को भी ईश्वर बनाकर अपना धंधा बनाए रखने में माहिर हैं । 

इस तथ्य के मद्देनजर चूंकि यादवों की संख्या भारत मे जनसंख्या के आधार पर सबसे ज्यादा है तो उन्ही के मूलनिवासी राजा (जैसा ह्वेनसांग ने लिखा ) को भगवान के रूप में प्रदर्शित करते हुए अपना बिज़नेस फैला लिया ।
बाल गंगाधर तिलक ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए "गीता रहस्य" के नाम से भगवतगीता का #व्यवसायिक अनुवाद किया और मूल अर्थ को तत्कालिक परिस्थितियों के मुताबिक़ करते हुए कर्मकांड को "कर्म या कार्य " के रूप में जनमानस के दिमाग में ठूँस दिया ।
जिस गीता के लिए कहा जाता है कि कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर , उसमें कर्म का मतलब काम या कार्य नही है । इसका मतलब है कि कर्मकांड किए जा ,बिना किसी विशेष फल की चाह के । 
अर्थात बुद्ध के समय में लोगों ने कर्मकांड को छोड़ दिया था ,कुछ लोग किसी विशेष #प्रयोजन की प्राप्ति के लिए यज्ञ हवन आदि कर्मकांड किया करते थे ,जैसे पुत्रप्राप्ति युद्ध मे विजय हेतु, गृहक्लेश शांति , मनोकामना पूर्ति आदि । जब इन पाखंडियों का धंधा चौपट होने लगा ,तब इन्होंने जैमिनी के पूर्वमीमांसा के सूक्तों को कृष्ण के मुँह से कहलवाया कि कर्म (कर्मकांड ) बिना किसी फल की इच्छा के ही करने चाहिए । जो बिना फल की इच्छा के कर्मकांड करते हैं उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है ।
उपरोक्त बातों को समझ कर हम ये निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि :-
1. भगवतगीता ब्राह्मणों द्वारा महाभारत के बहुत बाद तक लिखी गई है ।
2. इसमें बुद्ध के अहिंसा , वर्णीय-समानता के सिद्धांत , यज्ञ बलि कर्मकांड को नकारने के सिद्धांत को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया गया है ।
3. इसमें #जैमिनी कृत #पूर्वमीमांसा के सामान्य कर्म सिद्धांत को दार्शनिक व्याख्या की है । इसे यह कहकर स्थापित किया गया कि बिना फल की इच्छा के भी कर्मकांड करते रहना चाहिए ,ताकि ब्राह्मणों का धंधा चौपट ना हो ।
4. इसमें #बादरायण के #संख्या_दर्शन (गृह सूत्र ) का हूबहू विवेचन किया गया है ,जिसमें मोक्ष के कर्म(कर्मकांड) मार्ग को भगवान के मुँह से कहलवाया गया है कि मुझे प्राप्त करने के लिए कर्मकांड करने बेहद जरूरी हैं ।
5 . इसमें शूद्र व स्त्री को #पापयोनि कहकर अपमानित किया गया है ।
6 . जब कोई बात बिना तर्क के थोपनी हो तो एक ही रास्ता बचता है ,कि यह बात ईश्वर ने कही है । जहाँ ईश्वर का जिक्र भी आया वहां आदमी तर्क करना बंद कर देता है ।
     इन के अलावा ब्राह्मण का धंधा तो बदस्तूर जारी है ही । जब जब धर्म (ब्राह्मण) की हानि होगी तब तब ईश्वर (काल्पनिक) अवतार लेंगे ।
वो अब समझ आया ।
तर्क करो ,पाखण्ड हटाओ ।

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