कानून का अर्थ किसी व्यवस्था को स्थापित करने के उद्देश्य से बनाई गयी नियमावली है । कानून किसी एक नागरिक के अधिकार व कर्त्तव्यों का निर्धारण करता है । राष्ट्र के रूप में भले ही भारतीय नागरिकों को संविधान के अनुसार अधिकार व कर्त्तव्यों के आधार पर समान रूप से देखा जाता है ,मगर धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था आज भी हिन्दू आतंकियों के हाथ की कठपुतली बनी हुई है ।
एक हिन्दू को सामाजिक व धार्मिक वसीयत जन्म के आधार पर मिलती है । जिस जाति में वह जन्म लेता है ,वहीं से उसकी वसीयत तय की जाती है कि वह पूरी जिंदगी शोषक रहेगा या शोषित ।
अगर वह अस्पृश्य घोषित जातियों में जन्म लेता है तो उसके लिए जिंदगी पग-पग पर अपमान व पीड़ा भरी रहेगी । ये धार्मिक व सामाजिक व्यवस्था 100 साल बाद भी नही बदली ,क्योंकि अस्पृश्य जातियाँ उस धार्मिक व सामाजिक व्यवस्था के चक्रव्यूह को सही से समझ ही नही पाई हैं ।
जब आज़ाद भारत में मूंछे रखने पर अनुसूचित जाति के युवा की हत्या हिंदुओं द्वारा कर दी जाती है ।
जयभीम की रिंगटोन के कारण हत्या कर दी जाती है ,
नई गाड़ी खरीदने पर , कक्षा में अव्वल आने पर , मंदिर प्रवेश पर , घोड़ी रखने व घोड़ी चढ़ने पर , कुर्सी पर बैठने पर ,फसल काटने से मना करने पर , चक्की को छूने पर , आँख में आँख डालकर बात करने पर ......जान से मारने की कितनी घटनाएं आज 21वी सदी में हो रही हैं ।
सोचिए उस वक्त हमारे पुरखों ने क्या क्या सहा होगा ,जब रूढ़िवादी अतार्किक धर्मांध लोगों का समाज में एकाधिकार व्याप्त था ।
1923 में बम्बई की विधान परिषद ने एक आदेश में अस्पृश्य वर्ग के लोगों को सभी सार्वजनिक जलाशयों ,कुओं,धर्मशालाओं का इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी जिनका निर्माण व रखरखाव सरकारी निधि से किया जाता हो । साथ ही कहा कि वे सरकारी स्कूलों ,अदालतों ,कार्यालयों ,व डिस्पेंसरी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं ।
यह नोटिफिकेशन पढ़कर उस से पूर्व की स्थिति का सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है ।
आखिर इतनी सारी वर्जनाओं के पीछे के सामाजिक कानून का आधार क्या है ??
सुवरण हिन्दू एक अस्पृश्य को न पढ़ने देना चाहते हैं ,
न ईलाज करवाने की आज्ञा देते हैं ,
न अच्छे कपड़े पहनने की ,
न अच्छा भोजन करने की ,
न रहने के लिए पक्के खपरैल की इजाज़त ,
न अच्छे नाम रखने की अनुमति है ,
यहां तक कि वे उन्हें सामान्य रास्तों से गुज़रने की मनाही करते हैं ।
साथ ही उन्हें मरे पशु उठाने और गन्दगी साफ करने के लिए विवश करते हैं । बेगार के रूप में खेतों में दास की तरह कार्य करने को ,अशुभ समाचार को दूरवर्ती रिश्तेदारों को सूचित करने की बेगार , रुदाली के लिए तो आज तक इन्हें परम्परा के रूप में बेइज्जत किया जाता रहा है ।
इन सब कार्यों को करना अस्पृश्य वर्ग के लिए कानून की तरह रहा । मनाही करने का अंजाम कठोर दंड अथवा ,कुछ मामलों में मारपीट ,सामूहिक हत्या ,घर व बस्तियाँ जलाना आदि
या फिर सामाजिक बहिष्कार तो पक्का था ही ।
गौर से देखा जाए तो सुवर्णो की कामना ही वंचितों के लिए कानून बना दी गयी हैं । जिस तरह से वो चाहते हैं ,उसी तरह से अस्पृश्य वर्ग जीये ,यही वंचितों के लिए कानून था ।
अगर इसका उल्लंघन होता तो हिंसक हिंदुओं का यह धार्मिक सामाजिक कर्त्तव्य बन जाता कि वे अस्पृश्य वर्ग को दण्डित करे ।
कमाल की बात यह है कि सुवर्णो की किसी भी पीढ़ी ने इस निरन्तर हो रहे अत्याचार पर अपनी चोंच नही खोली । ये अहसान फ़रामोश आरक्षण पर अपना गला फाड़ कर रोयेंगे , जातीय अपशब्द कहने , वोट माँगने के लिए ,मंदिर के लिए चंदा माँगने , सजातीय बलात्कारियों के लिए तिरँगा यात्रा निकालने के लिए आपको सड़कों पर रेंगते मिल जाएंगे ,मगर इस धार्मिक-सामाजिक अन्याय के लिए इनकी जुबान पर ताला लग जाता है ।
वंदना कटारिया हॉकी खिलाड़ी के घर पर पटाख़े फोड़कर नाचने वाले हिंदू सुवर्ण की माँ का दूसरा ब्याह उस घर में तय नही हुआ था ,ना ही उसकी बहन का लग्न टीका लेकर वो वहां गया था , उसके दिमाग में धार्मिक व जातीय कुंठा भरी थी ,ऐसा करके उसे अंदरूनी संतुष्टि मिली होगी ,उसके भीतर कुलबुलाहट कर रहे जातीय कीड़े ने शायद उसके बाद उसे काटना बन्द कर दिया हो ।
एक वर्ग का दूसरे वर्ग के प्रति यह व्यवहार कितना दुष्टतापूर्ण है । आखिर उस अत्याचारी वर्ग को क्या उपमा दी जाए ??
क्या कहा जाए उस धर्म को जिसे इन अमानवीय नियमों को संकलित कर के खड़ा किया गया है ।
क्या इस धर्म को ढोते रहना चाहिए ,जिसने हमारे पुरखों को इतना दर्द दिया और आज भी हमारा हर तरह से शोषण कर रहा है ??
नहीं ....बिल्कुल नही !!
चलो बुद्ध की राह