Saturday, October 5, 2019

मिशनरी गीत : भीमसैनिकों ! जाति संहार करो भीमसैनिकों



शिक्षा से नाता जोड़ो ,
पूजा पाखण्ड को छोड़ो ,
ठग-धर्म के मर्म को जानो
तुम भीम के वंशज हो ,
भीम सैनिकों ,
मेरे भीम सैनिकों !
जाति संहार करो भीम सैनिकों !
दुश्मन पे वार करो ,भीम सैनिकों

तोड़ो वो दीपक ,जो मौत पे जलते हैं ,
छोड़ो रंगों को जो घाव पे मलते हैं ।
अपना उत्सव ज्ञान दिवस जो
आता चौदह अप्रिल को,
इस दिन जन्मे भीमराव ,जो
हर्षाये बहुजन दिल को ।
अपने त्यौहार चुनो .......
मेरे भीम सैनिकों , जाति संहार करो ....भीम सैनिको

छोड़ो मन्दिर को , क्यों हमें  जाना है ,
अपनी मंजिल तो सत्ता को पाना है ,
सामाजिक सत्ता अपनी थी
 बौद्ध की राह दिखाई थी ,
दो कदमों से दुनिया भर में
 जिसने पहुँच बनाई थी  ।
अपना इतिहास सुनो .......
मेरे भीम सैनिकों ,जाति संहार करो ,
भीम सैनिकों  दुश्मन पर वार करो भीम सैनिकों ।

जानो ! ज्योतिबा फुले सावित्रीबाई को ,
असली दाता को ,उस माता रमाई को ।
तुम असली शासक भारत के ,
कोरेगांव के नायक हो ।
वीर उधमसिंह ,पेरियार
कांसी ,फूलन-से लायक हो ।
खुद अपने दीप बनो  ...
मेरे भीम सैनिकों , जाति संहार करो ,भीम सैनिकों ।

गायन सम्बन्धी सहायता के लिए 👇https://youtu.be/62xELrYF-mE 

तर्ज : देशप्रेमियो ,आपस में प्रेम करो


वीडियो एडिटिंग के लिए विशेष आभार क्षितिज

Thursday, October 3, 2019

लेकिन भारत मे बुद्ध के हत्यारे कौन हैं सरकार ???


पहला दृश्य : 
समाज मे चारों तरफ शांति ,भाईचारा , समानता , समृद्धि और प्यार है । अब पहले की भांति बलि वाले यज्ञ नही होते ,लोग कर्मकांड बिल्कुल छोड़ चुके हैं ,पाखण्डों को छोड़कर स्वयं को अंदरूनी ज्ञान से प्रकाशित करने में लगे हैं । 
स्त्रियों और शूद्रों को भिक्षु -भिक्षुणी के रूप में पूरा सम्मान मिल रहा है । लोग समझ चुके हैं कि संसार मे दुःख का कारण इच्छाएं हैं ।
परलोक का प्रलोभन अब ठगी और ढ़कोसला माना जाता है । सभी मेहनती लोग अच्छी जीवन शैली के चलते खुशहाल ,करुणाशील और शांतवृति के बन चुके हैं ।
लोग देवताओं की पूजा को नकार चुके हैं , अब हर कार्य की तार्किक व्याख्या की जाती है ।

दूसरी तरफ ,
इसी समाज में पाखण्ड के ठेकेदार धर्मखोर लोग बेहद दुःखी हैं , ये वो लोग हैं जिनका व्यवसाय यज्ञ ,बलि , कर्मकांड, दान ,शकुन-अपशकुन,शुभ-लाभ ,पवित्र-अपवित्र,देव-दानव,मोक्ष , ऊंच-नीच ,स्वर्ग-नरक आदि पर टिका हुआ था । ये भूखे मरने की स्थिति में हैं ,क्योंकि सभी कामगारों को जाति में विभाजित करने वाले ठगों ने खुद का कोई काम रखा ही नही ।  मेहनत इनसे होती नही।
इन्ही लोगों ने बुद्ध से पहले पूरे समाज पर एकछत्र राज किया था , घर बैठे इनको इतनी दान दक्षिणा मिलती थी कि इसी के दम पर समाज ,राजा और ग्रह-नक्षत्रों तक को काबू में रखते थे ।
आज भी ये पुराने दिनों को याद करके परेशान हैं ।
इनका दिमाग लगातार साज़िश और ठगी के तरीके ईजाद करने पर ही केंद्रित था ,अवसर की तलाश में था ।

और इनको मौका बहुत जल्द ही मिल भी गया ।

यह मौर्य साम्राज्य के अंतिम सम्राट बृहद्रथ का शासनकाल था । उनके एक ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने धोखे से उन्हें मारकर खुद को राजा घोषित कर दिया ।
यही से शुरू हुआ ऊंच नीच,पाखण्ड,साजिशों ,अंधविश्वास ,और धर्मख़ोरी का नया अध्याय ।
इसी कालखण्ड में इस विशेष वर्ग के स्वार्थो को धर्म का नया जामा पहनाया गया । मनुस्मृति जैसे कपटपूर्ण ग्रन्थ लिखे गए , काल्पनिक कथाएं ,पात्र ,देवी देवता , अवतार ,स्वर्ग नरक के साथ साथ उन सभी सम्भावनाओं को जड़ से खत्म किया गया ,जिनकी बदौलत बुद्ध ने इनका दाना पानी बन्द किया था ।
बुद्ध के प्रतिकार में इसी वक्त भगवतगीता भी लिखी गयी । भगवतगीता को आम हिंदू आस्थावान होकर ईश्वरीय कृति मान लेता है,यही कारण है कि इस पर तार्किक बहस नही हो पाती । मगर कुछ तर्क हैं जो यह साबित करने को काफ़ी हैं ,कि यह पुस्तक बुद्ध के काफी बाद की रचना है ।

गीता में कृष्ण-अर्जुन संवाद के जरिए मुख्य रूप से मोक्ष यानि मृत्यु पर चर्चा की गई है ,जिसके तीन मार्ग बताये गए हैं :
अध्याय 1 से 6 तक ज्ञान मार्ग ,
7 से 12 तक कर्म मार्ग और 13 से 18 तक  भक्ति मार्ग । 
इन अध्यायों में हिंसा ,कर्मकांड ,चातुर्वर्ण्य कर्त्तव्य पर सर्वाधिक बल दिया गया है ।
 यहां कर्म से अभिप्रायः काम से बिल्कुल नही है ,कर्म का सीधा अर्थ कर्मकांडी आयोजन अर्थात यज्ञ ,हवन,दान ,दक्षिणा, जगराते टाइप धार्मिक आयोजन,भोग आदि है । 
गौर से देखने पर ज्ञात होगा कि बुद्ध ने जिन बातों का विरोध किया था ,उन्ही बातों को, काल्पनिक श्रीकृष्ण को भगवान के रूप में स्थापित करके ,उनके मुख से कहलवाया गया ।

बुद्ध ने हिंसा का विरोध किया ,लेकिन गीता में कृष्ण ने हिंसा को धर्म के रूप में प्रस्तुत किया ।
गीता का अध्याय 1 से 6 तक यह कहना कि 'यह हत्या करना हत्या नही है ,क्योंकि जिसकी हत्या हो रही है ,वह शरीर है ,आत्मा नही ....यह हत्या का बेहद मूर्खतापूर्ण बचाव है ।

बुद्ध के सरल धम्म मार्ग के विपरीत
कर्मकांड को पुनर्स्थापित करते हुए गीता ने बिना फल की इच्छा किए कर्मकांड करते रहने की बात कही ,क्योंकि इससे पहले कर्मकांड विशेष फल के प्राप्त करने के लिए किए जाते थे ,
यानि खुशहाली के दिनों में भी इनका धंधा बन्द नही होना चाहिए ।
इस तरह अध्याय सात से बारह तक कर्मकांड पर ही ध्यान केंद्रित किया ।

बुद्ध ने वर्णव्यवस्था का घोर खण्डन किया ,जिसे पुनर्स्थापित करना बेहद जरूरी था । पाखण्डियों ने इसे भी ईश्वरीय व्याख्यान के रूप में प्रस्तुत करने की साज़िश की ।
इसे स्थापित करने के लिए गीता में सबसे ज्यादा मेहनत की है ।
अठाहरवें अध्याय के 41 से 48 श्लोक में बस यही कहा गया है कि सभी लोग अपने वर्णानुसार कर्मकांड करें ।
"जो अपने वर्ण धर्म का पालन नही करते ,उन्हें मोक्ष प्राप्त नही होता ।"
एक श्लोक में कृष्ण अपने भक्तों को डराते हुए कहते हैं कि कितनी भी भक्ति कर लो ,अगर वर्णधर्म का पालन नही किया तो तुम मुझे कभी प्राप्त नही कर सकते।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बुद्ध के विचारों को खत्म करने के लिए ही भगवतगीता की रचना की गई थी । इसका रचनाकाल महाभारत के लेखन के बाद का रहा है ।
जैमिनी कृत पूर्वमीमांसा और बादरायण के ब्रह्मसूत्र को नए दार्शनिक अंदाज में यह कहकर पेश किया गया कि 'मैं बोल रहा हूँ ईश्वर ,मैं ही सब कुछ हूँ ।"
और इस तरह भारत मे बुद्ध के विचारों की हत्या कर दी गयी 😢

सुरेंद्र अम्बेडकर

*विषय सामग्री 'डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण साहित्य वोल्यूम-7

Wednesday, October 2, 2019

नारी शिक्षा से काँपता हिन्दू धर्म



नौ साल की उम्र में शादी का धार्मिक-शास्त्रीय प्रावधान इसलिए रखा गया था ,ताकि स्त्री पढ़ ना सके ।
माहवारी के बाद जो पिता अपनी पुत्री की शादी नही करता ,वह उसका वही रक्त पीता है ,ये लिखने वाले धार्मिक ठग आखिर चाहते क्या थे ????
एक तरफ पुरुष के लिए 25 वर्ष ब्रह्मचर्य आश्रम और स्त्री के लिए नादान उम्र में पति-परमेश्वर ???
स्त्रियों के लिए ये क्रूर नियम क्यों ??
कोई मूर्ख उसे 'ताड़न का अधिकारी ' बता रहा है तो कोई 'एकांत का दुरुपयोग करने वाली ' । सारे व्रत ,सारे गुनाह , सारे एहतियात स्त्री के पल्ले बांधने की वजह क्या रही होगी ???
सती प्रथा ,जौहर ,कन्या वध , दहेज , देवदासी, वैधव्य प्रताड़ना, पर्दा प्रथा .....सब नारी को ही क्यों ???
क्या अपनी माँ, बहन ,बीवी ,बेटी के प्रति इतना क्रूर है हमारा समाज ???

किसने बनाई इतनी क्रूर नियमावली ???
सनातन संस्कृति का आधार क्या यही क्रूरताएँ हैं ??
जब जब नारी ने पढ़ने की सोची , धार्मिक पाखण्डियों के पसीने क्यो आये ??
क्योंकि धर्म डरता है शिक्षा से ,
जो कि ज्ञान देती है और तर्क सिखाती है । जहाँ तर्क है ,जिसके चलते धर्म को आस्था के पीछे छुपना पड़ता है ।
गौरी लंकेश से इतना डरा सनातन धर्म कि उनकी हत्या ही करा डाली ।

अगर स्त्री ने धर्म के स्वार्थपूर्ण नियमों को समझ लिया तो कौन ढोएगा धर्म के आधार - इस पाखण्ड को ???
कलश यात्रा , जागरण,व्रत कथा , सत्संग,कथाएं , रिवाज, दक्षिणा, जिद,सस्वर नृत्य ,आभूषण,बन्धन ,रिश्ते ,समागम,पवित्रता,सात जन्म,वचन ,सब बोझ पुरुष के बस का थोड़े ही है ???

जे एन यू में चंद लड़कियों ने आजादी क्या माँगी , धर्म से लेकर राष्ट्रवाद तक को 'धर्मखोर पाखण्डियों' ने अपने चारों तरफ लपेट लिया । बी एच यू वाराणसी में पुलिस ने बेटियों पर लाठियां भांजी । धर्म की नगरी बनारस पवित्र काशी में ये नही होगा तो कहां होगा ???
क्योंकि उसी बनारस में विधवाओं को 'सभी मानवीय हकों' से वंचित रखकर उनके 'बीमार पति-परमेश्वर की मृत्यु या आत्महत्या 'का दंड देने की बहुत पुरानी परंपरा रही है । यहां नारी को जिस्म के रूप में देखने के आदी 'वहशी कुत्तों' के लिए सब नारियाँ एक उपभोग की चीज-वस्तु मात्र हैं ।
जेएनयू ,बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में जो घटित हुआ ,यह नया तरीका नही है ।

इन्ही पाखंडी ठगों के पूर्वजों ने पुणे में सावित्री बाई फूले के साथ भी तो यही किया था । उनके कपड़ों पर गोबर ,कीचड़ डालने की बात तो सबने सुन रखी है ,लेकिन क्या आप जानते हैं इन धर्म के ठेकेदारों ने बालिका शिक्षा को बंद करने की दूसरी नीच साजिश कौनसी की ???
1848 में भीड़ेवाड़ा बुधवार पेठ पुणे में जिस पहली बालिका स्कूल की स्थापना की गयी थी ,उस स्कूल के आजू-बाजू बुधवार पेठ में आज एशिया की दूसरी सबसे पुरानी 'जिस्म की मंडी' कैसे बना दिया गया ????

https://www.bhaskar.com/news/MH-PUN-HMU-pune-firm-provide-legal-help-to-budhwar-peth-sex-workers-news-hindi-5400826-PHO.html


रेड-लाइट एरिया बसाने वाले लोग किस जाति वर्ग के होते हैं ???
धर्म की दुहाई देने वाले , धर्म के होलसेलर ,डीलर और ठेकेदार कौन लोग हैं , ये हम आसानी से समझ सकते हैं ।
कैसे बहुत ही नीचता से स्त्री-शिक्षा के पहले अंकुरण के आसपास तेज़ाब बिखेरा गया , ताकि भविष्य में धर्म के खिलाफ किसी क्रांति का आधार ही न बन पाए ।
आज भी जब किसी लड़की द्वारा घर पर खुद से छेड़छाड़ की बात कही जाती है ,अधिकतर परिवार उसको घर मे कैद करने का उपचार करते हैं ।
 रेप विक्टिम को उसके कपड़े ,रहन सहन और बेखौफ हँसी के लिए कोसा जाता है ।
आखिर क्या गुनाह किया उसने समाज का सृजनहारी बनने की क्षमता पाकर ????
काश ! हर औरत इस धार्मिक साजिश को समझ पाती !!!!
मैं फिर दोहराऊंगा , संविधान नही होता तो नारी का अस्तित्व सिर्फ और सिर्फ 'भोग-विलास की वस्तु ' होने तक ही सिमट जाता । इसलिए पौराणिक भागवत कथाओं की बजाय संविधान से प्राप्त 'नारी अधिकार की धाराओं ' के प्रचार कीजिये ताकि कोई भी रिश्ता उस से कुछ भी धार्मिक प्रपंच के नाम पर लूट ना पाए ।
धर्म-ग्रंथ नही ,आईपीसी की धाराएं पढ़ाइये अपनी बेटियों को ।
व्रत नही ,भरपेट खिलाइए अपनी बेटियों को ,
दहेज के लिए धन जोडने की बजाय ,अच्छी शिक्षा पर खर्चे ,
संस्कार नही जूडो कराटे सिखाइये अपनी बेटियों को !!!
और अगर उसके साथ कोई भी अनहोनी होती है
,तो उसे अहसास दीजिये कि पापा ,पति या भाई उसे समाज द्वारा स्त्री होने की परम्परागत सजा नही थोपने देंगे ।


असुरेन्द्र अम्बेडकर

पटीकरा में भारतीय बौद्ध महासभा के सहयोग से मनाया गया बौद्ध जागरूकता कार्यक्रम

नारनौल खण्ड के पटीकरा गांव में डॉ भीमराव अंबेडकर नवयुवक मंडल पटीकरा के बैनर तले एक सामाजिक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम ...