पहला दृश्य :
समाज मे चारों तरफ शांति ,भाईचारा , समानता , समृद्धि और प्यार है । अब पहले की भांति बलि वाले यज्ञ नही होते ,लोग कर्मकांड बिल्कुल छोड़ चुके हैं ,पाखण्डों को छोड़कर स्वयं को अंदरूनी ज्ञान से प्रकाशित करने में लगे हैं ।
स्त्रियों और शूद्रों को भिक्षु -भिक्षुणी के रूप में पूरा सम्मान मिल रहा है । लोग समझ चुके हैं कि संसार मे दुःख का कारण इच्छाएं हैं ।
परलोक का प्रलोभन अब ठगी और ढ़कोसला माना जाता है । सभी मेहनती लोग अच्छी जीवन शैली के चलते खुशहाल ,करुणाशील और शांतवृति के बन चुके हैं ।
लोग देवताओं की पूजा को नकार चुके हैं , अब हर कार्य की तार्किक व्याख्या की जाती है ।
दूसरी तरफ ,
इसी समाज में पाखण्ड के ठेकेदार धर्मखोर लोग बेहद दुःखी हैं , ये वो लोग हैं जिनका व्यवसाय यज्ञ ,बलि , कर्मकांड, दान ,शकुन-अपशकुन,शुभ-लाभ ,पवित्र-अपवित्र,देव-दानव,मोक्ष , ऊंच-नीच ,स्वर्ग-नरक आदि पर टिका हुआ था । ये भूखे मरने की स्थिति में हैं ,क्योंकि सभी कामगारों को जाति में विभाजित करने वाले ठगों ने खुद का कोई काम रखा ही नही । मेहनत इनसे होती नही।
इन्ही लोगों ने बुद्ध से पहले पूरे समाज पर एकछत्र राज किया था , घर बैठे इनको इतनी दान दक्षिणा मिलती थी कि इसी के दम पर समाज ,राजा और ग्रह-नक्षत्रों तक को काबू में रखते थे ।
आज भी ये पुराने दिनों को याद करके परेशान हैं ।
इनका दिमाग लगातार साज़िश और ठगी के तरीके ईजाद करने पर ही केंद्रित था ,अवसर की तलाश में था ।
और इनको मौका बहुत जल्द ही मिल भी गया ।
यह मौर्य साम्राज्य के अंतिम सम्राट बृहद्रथ का शासनकाल था । उनके एक ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने धोखे से उन्हें मारकर खुद को राजा घोषित कर दिया ।
यही से शुरू हुआ ऊंच नीच,पाखण्ड,साजिशों ,अंधविश्वास ,और धर्मख़ोरी का नया अध्याय ।
इसी कालखण्ड में इस विशेष वर्ग के स्वार्थो को धर्म का नया जामा पहनाया गया । मनुस्मृति जैसे कपटपूर्ण ग्रन्थ लिखे गए , काल्पनिक कथाएं ,पात्र ,देवी देवता , अवतार ,स्वर्ग नरक के साथ साथ उन सभी सम्भावनाओं को जड़ से खत्म किया गया ,जिनकी बदौलत बुद्ध ने इनका दाना पानी बन्द किया था ।
बुद्ध के प्रतिकार में इसी वक्त भगवतगीता भी लिखी गयी । भगवतगीता को आम हिंदू आस्थावान होकर ईश्वरीय कृति मान लेता है,यही कारण है कि इस पर तार्किक बहस नही हो पाती । मगर कुछ तर्क हैं जो यह साबित करने को काफ़ी हैं ,कि यह पुस्तक बुद्ध के काफी बाद की रचना है ।
गीता में कृष्ण-अर्जुन संवाद के जरिए मुख्य रूप से मोक्ष यानि मृत्यु पर चर्चा की गई है ,जिसके तीन मार्ग बताये गए हैं :
अध्याय 1 से 6 तक ज्ञान मार्ग ,
7 से 12 तक कर्म मार्ग और 13 से 18 तक भक्ति मार्ग ।
इन अध्यायों में हिंसा ,कर्मकांड ,चातुर्वर्ण्य कर्त्तव्य पर सर्वाधिक बल दिया गया है ।
यहां कर्म से अभिप्रायः काम से बिल्कुल नही है ,कर्म का सीधा अर्थ कर्मकांडी आयोजन अर्थात यज्ञ ,हवन,दान ,दक्षिणा, जगराते टाइप धार्मिक आयोजन,भोग आदि है ।
गौर से देखने पर ज्ञात होगा कि बुद्ध ने जिन बातों का विरोध किया था ,उन्ही बातों को, काल्पनिक श्रीकृष्ण को भगवान के रूप में स्थापित करके ,उनके मुख से कहलवाया गया ।
बुद्ध ने हिंसा का विरोध किया ,लेकिन गीता में कृष्ण ने हिंसा को धर्म के रूप में प्रस्तुत किया ।
गीता का अध्याय 1 से 6 तक यह कहना कि 'यह हत्या करना हत्या नही है ,क्योंकि जिसकी हत्या हो रही है ,वह शरीर है ,आत्मा नही ....यह हत्या का बेहद मूर्खतापूर्ण बचाव है ।
बुद्ध के सरल धम्म मार्ग के विपरीत
कर्मकांड को पुनर्स्थापित करते हुए गीता ने बिना फल की इच्छा किए कर्मकांड करते रहने की बात कही ,क्योंकि इससे पहले कर्मकांड विशेष फल के प्राप्त करने के लिए किए जाते थे ,
यानि खुशहाली के दिनों में भी इनका धंधा बन्द नही होना चाहिए ।
इस तरह अध्याय सात से बारह तक कर्मकांड पर ही ध्यान केंद्रित किया ।
बुद्ध ने वर्णव्यवस्था का घोर खण्डन किया ,जिसे पुनर्स्थापित करना बेहद जरूरी था । पाखण्डियों ने इसे भी ईश्वरीय व्याख्यान के रूप में प्रस्तुत करने की साज़िश की ।
इसे स्थापित करने के लिए गीता में सबसे ज्यादा मेहनत की है ।
अठाहरवें अध्याय के 41 से 48 श्लोक में बस यही कहा गया है कि सभी लोग अपने वर्णानुसार कर्मकांड करें ।
"जो अपने वर्ण धर्म का पालन नही करते ,उन्हें मोक्ष प्राप्त नही होता ।"
एक श्लोक में कृष्ण अपने भक्तों को डराते हुए कहते हैं कि कितनी भी भक्ति कर लो ,अगर वर्णधर्म का पालन नही किया तो तुम मुझे कभी प्राप्त नही कर सकते।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बुद्ध के विचारों को खत्म करने के लिए ही भगवतगीता की रचना की गई थी । इसका रचनाकाल महाभारत के लेखन के बाद का रहा है ।
जैमिनी कृत पूर्वमीमांसा और बादरायण के ब्रह्मसूत्र को नए दार्शनिक अंदाज में यह कहकर पेश किया गया कि 'मैं बोल रहा हूँ ईश्वर ,मैं ही सब कुछ हूँ ।"
और इस तरह भारत मे बुद्ध के विचारों की हत्या कर दी गयी 😢
सुरेंद्र अम्बेडकर
*विषय सामग्री 'डॉ अम्बेडकर सम्पूर्ण साहित्य वोल्यूम-7


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